जीवन – सिन्धु

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मैंने शीशे के टुकड़े से, दर्पण बनते देखा है;
और दर्पण को टुकड़ों में, भी बिखरते देखा है।
कुछ ऐसा रहा है सबक, जीवन की इन राहों का;
अपनी कश्ती पर साहिल को, उतरते-चढ़ते देखा है।

इलाही बख्शना ना कभी, मुझे किनारों के सन्नाटे;
लहराऐ मेरी पतवार, सागर जब लहरें छाँटे।
बढ़ा देना मेरी नज़रों के, पैमाने मेरे मालिक;
वक्त के जिस छोर पर तू, सपनों की सौगातें बाँटे।

जीवन के समंदर में, मेरी कश्ती मेरे सपने;
बेगानी इन तरंगों पर, ये सुर-ताल मेरे अपने।
कल कोई जब लहरों से, मेरी कश्ती का पता पूछे;
लहरें सागर को चीरें, कि आसमाँ भी लगे कँपने।

 – कृपाशीष

 

सँघर्ष

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जब झूठे दिलासे तोडें दम तिल-तिल कर ,
जब छटपटाये मन यथार्थ के जलधि में ;
तब थाम के साँस एक लहर चला जा ,
सब सन्नाटों को करे खामोश ऐसी ड़गर चला जा ;

तू गीत अपने प्रियतम के गुनगुनाता चला जा।

जब बीच भँवर नैया डोले ,
जब विश्वास की कसक ढीली होवे ;
तब हर घाव में उन्माद जगाता चला जा ,
हर प्रश्न को एक हल थमाता चलाता जा।

जब नैया तेरी तूफानों से टकराये ,
जब प्रकाश-स्तंभ सूझे नहीं और मन चकराये ;
तब गीत अपनी जीत के लहरों पर तैराता चला जा ,
हर कर्कश वेदना को धुन बनाता चला जा।

जब निराशाओं के बोझ तले साँसें दबती नज़र आयें ,
तब रुक, एक पल विश्राम ले,
समझा कर हृदय को राह अपनी चला जा;
विश्वास खुद में खो नहीं,
मूक अँधेरी रातों में किलकारी गुँजाता चल जा ;

तू गीत सुनहले सावन के गुनगुनाता चला जा।

– कृपाशीष

मेरा पहला सपना

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मैं जब उठा था गर्भ-निद्रा से पहली बार,
आँखें मूँदे पलने में रोया था कई-कई बार।
तब एक दुलार ने रोकी थी पुचकारकर वो अश्रु-धार,
मेरा पहला सपना तो था उसी दुलार का उपहार।

मेरा पहला सपना मेरी आँखों में तभी आया होगा,
जब लोरी गा तूने मुझे कँधे पर अपने सुलाया होगा।
तब जब कि न थी पहचान तेरी इस दुनिया से,
सोचता हूँ कि तब मेरे सपने में क्या आया होगा।

यार दोस्त तब थे कहाँ जिनके कि खेल याद आते,
तान न छिड़ी थी इस जीवन की तो धुन क्या कोई बनाते।
तब एक ही आवाज़ तो पहचानते थे,
बस एक ही स्पर्श तो जानते थे।

तो नींद में तेरा ही चेहरा,
तेरा ही नूर समाया होगा।
माँ वो मेरा पहला सपना,
तुझसे हो शुरू तुझमें ही समाया होगा।

– कृपाशीष

माँ

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माँ कोई वस्तु नहीं जिसका कि वर्णन तुम्हें सुनाऊँ,
माँ कोई उपमा नहीं जिस पर कि छंद अनूठे बनाऊँ।
माँ कोई चित्र भी नहीं जिसे कि खींच दिखलाऊँ,
माँ कोई साज़ नहीं जिससे कि सँगीत मधुर बजाऊँ।

कभी आटे बेसन के बीच गुनगुनाता गीत है माँ,
कभी भुला सारी सीमाएँ साथ खेलती मीत है माँ।
गोबर से लिपे चबूतरे पर कभी हाथों की रंगोली है माँ,
कभी उसी आँगन में धान कूटती श्रम की हमजोली है माँ।

हुआ कभी जो दर्द कहीं तो दिल से निकली आह है माँ,
उस आह पर अनिमेष दौड़ती एक ख़ामोश कराह है माँ।
घावों को सहलाती,
लापरवाही पर डाँट बताती क्रोध में छुपा स्नेह है माँ,
सूखे कंठ की प्यास बुझाती तानसेनी राग ‘मेह ‘ है माँ।

उम्मीदों के पतझड़ में आशाओं का बरसता सावन है माँ,
तो कभी सुख के बसंत में धूप का अनुशासन है माँ।
उसी धूप में क्रिकेट खेलने की ज़िद पर बारह का पहाड़ा है माँ,
नहीं भूलते वो दिन आज भी रंग बचपन का इतना गाढ़ा है माँ।

आज नहीं जो साथ मेरे तो भी तुझे अपने में कहीं पाता हूँ,
अपने हिस्से की कच्ची धूप में , मैं तुझे ही सहलाता हूँ।
मेरे ह्रदय के मर्म में स्थित तू मोक्षदायी सुगंध है माँ,
मैं तेरी ही प्रतिमूर्ति, तू प्रकृति का प्रतिबिम्ब है माँ।

– कृपाशीष