सँघर्ष

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जब झूठे दिलासे तोडें दम तिल-तिल कर ,
जब छटपटाये मन यथार्थ के जलधि में ;
तब थाम के साँस एक लहर चला जा ,
सब सन्नाटों को करे खामोश ऐसी ड़गर चला जा ;

तू गीत अपने प्रियतम के गुनगुनाता चला जा।

जब बीच भँवर नैया डोले ,
जब विश्वास की कसक ढीली होवे ;
तब हर घाव में उन्माद जगाता चला जा ,
हर प्रश्न को एक हल थमाता चलाता जा।

जब नैया तेरी तूफानों से टकराये ,
जब प्रकाश-स्तंभ सूझे नहीं और मन चकराये ;
तब गीत अपनी जीत के लहरों पर तैराता चला जा ,
हर कर्कश वेदना को धुन बनाता चला जा।

जब निराशाओं के बोझ तले साँसें दबती नज़र आयें ,
तब रुक, एक पल विश्राम ले,
समझा कर हृदय को राह अपनी चला जा;
विश्वास खुद में खो नहीं,
मूक अँधेरी रातों में किलकारी गुँजाता चल जा ;

तू गीत सुनहले सावन के गुनगुनाता चला जा।

– कृपाशीष

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