जीवन – सिन्धु

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मैंने शीशे के टुकड़े से, दर्पण बनते देखा है;
और दर्पण को टुकड़ों में, भी बिखरते देखा है।
कुछ ऐसा रहा है सबक, जीवन की इन राहों का;
अपनी कश्ती पर साहिल को, उतरते-चढ़ते देखा है।

इलाही बख्शना ना कभी, मुझे किनारों के सन्नाटे;
लहराऐ मेरी पतवार, सागर जब लहरें छाँटे।
बढ़ा देना मेरी नज़रों के, पैमाने मेरे मालिक;
वक्त के जिस छोर पर तू, सपनों की सौगातें बाँटे।

जीवन के समंदर में, मेरी कश्ती मेरे सपने;
बेगानी इन तरंगों पर, ये सुर-ताल मेरे अपने।
कल कोई जब लहरों से, मेरी कश्ती का पता पूछे;
लहरें सागर को चीरें, कि आसमाँ भी लगे कँपने।

 – कृपाशीष

 

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